लैंगिक भेदभाव को तोड़ा
लेकिन यह इतना आसान नहीं था। शुरुआत में, ग्रामीण समुदाय, विशेष रूप से महिलाओं ने उन्हें खारिज करने की नजर से देखा। रानी मिस्त्रियों में से एक पूनम देवी याद करती हैं कि कैसे उनकी सास उनके राजगीर का काम सीखने के खिलाफ थीं। हालांकि, अपने पति के मजबूत समर्थन से वह शुरुआत करने में सक्षम हुईं। उन्होंने कहा कि ‘जब उन्होंने हमें आर्थिक रूप से स्वतंत्र होते देखा, तो हमें खारिज करने वाले बहुत से लोगों ने चोरी-छिपे पूछना शुरू किया कि वे भी यह काम कैसे सीख सकते हैं। महिलाएँ जब एक साथ खड़ी हो गयीं, तो समुदाय भी नरम पड़ गया।’
महिलाओं ने एक और वर्जना भी तोड़ी है। इससे पहले, वे काम करने के लिए अपने गाँवों से बाहर जाने के बारे में कभी सोच नहीं सकती थीं। महिलाओं ने या तो घर पर या खेत मजदूर के रूप मेंकाम किया था । लेकिन अब चीजें बदल गयी हैं। ‘शौचालय बनाने के लिए अनुरोध किये जाने पर हम अब अन्य गाँवों की यात्रा करते हैं। वास्तव में, हम लोग वहाँ के घर की महिलाओं से हमारी मदद करने के लिए कहते हैं। जब हम लौटने लगते हैं, तो उनमें से कुछ कहती हैं कि वे भी हमारी तरह बनना चाहते हैं।’
अन्य महिलाओं के साथनिशात ने शौचालय निर्माण की तकनीकी पर राँची शहर में प्रशिक्षण लिया था। सप्ताह भर चलने वाले मॉड्यूल में उन्हें सिखाया गया कि कैसे एक स्थल का निरीक्षण किया जाये और शौचालय निर्माण के लिए सबसे अच्छी जगह का आकलन किया जाये। उन्होंने सोख्ता गड्ढों और जुड़वाँ गड्ढों के पीछे की तकनीक भी जानी और उन्हें निर्माण तकनीक पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। एक हफ्ते के बाद, अपना खुद का काम शुरू करने से पहले, उन्होंने एक वरिष्ठ राजमिस्त्री के मातहत काम सीखा।
अब जब महिलाएँ काम करने बाहर जाती हैं, तो वे हमेशा परिवार को अपने घर के आंगन में शौचालय बनवाने की सलाह देती हैं। उषा रानी कहती हैं कि ‘पारंपरिक सोच लोगों को घर के भीतर शौचालय बनाने से रोकती है। लेकिन हमें लगता है कि शौचालय परिसर के भीतर ही होना चाहिए ताकि रात में महिलाओं के लिए आसानी हो। हमें हमारे समुदाय की महिलाओं के लिए कुछ करने की जरूरत है और शौचालय पर जोर देना हमारे हित में है।’
रानी मिस्त्री के रूप में उन्होंने निर्माण मजदूर के रूप में होने वाली अपनी कमाई से दोगुनी कमाई की। निशात, जिसका पति बेरोजगार है, अपनी नयी कमाई से उत्साहित है। ‘मैं अपनी कमाई अपने बच्चों की शिक्षा के लिए बचा लेती हूँ। यहाँ तक कि खुद पर खर्च करने के लिए भी अब मेरे पास नकदी बच जाती है।’
उषा रानी निशात में भरे नये विश्वास की पुष्टि करती हैं। ‘हमने जो कौशल सीखा है, उससे हमें बहुत गर्व होता है। मुझमें अब ज्य़ादा आत्मविश्वास है और अपने होने की सार्थकता महसूस होती है।’
उषा रानी अपनी बेटी शीतल छैया के साथ हजारीबाग ब्लॉक, झारखंड में। उषा अब अपने कौशल में जोड़ने के लिए प्लंबिंग का काम सीखना चाहती हैं।